विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा- स्टैच्यू ऑफ यूनिटी - SSC EXAM LIVE

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा- स्टैच्यू ऑफ यूनिटी

विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा- स्टैच्यू ऑफ यूनिटी
वडोदरा के पास नर्मदा जिले में स्थित सरदार सरोवर के केवाड़िया कॉलोनी गांव में सरदार वल्लभभाई पटेल की 182 मीटर ऊंची मूर्ति तैयार है।

नर्मदा के बांध पर बनी यह मूर्ति सात किलोमीटर दूर से नजर आती है। स्टैच्यू में लगी लिफ्ट से पर्यटक सरदार के हृदय तक जा सकेंगे। यहां से लोग सरदार सरोवर बांध के अलावा नर्मदा के 17 किमी लंबे तट पर फैली फूलों की घाटी का नजारा देख सकेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पटेल के जन्मदिन पर 31 अक्टूबर को इस प्रतिमा का अनावरण किया। इससे पहले उन्होंने गंगा, यमुना, नर्मदा समेत 30 छोटी-बड़ी नदियों के जल से प्रतिमा के पास स्थित शिवलिंग का अभिषेक किया। 30 ब्राह्मणों ने मंत्रोच्चार किया।

यह दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति है। इसके बाद 128 मीटर ऊंची चीन की स्प्रिंग बुद्ध और न्यूयॉर्क की 90 मीटर ऊंची स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी का नंबर आता है।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के निर्माण में पांच साल (60 महीने) का वक्त लगा। सबसे कम समय में बनने वाली यह दुनिया की पहली प्रतिमा है। दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा चीन के लेशान में हैं। बुद्ध की 128 मीटर ऊंची यह प्रतिमा करीब 90 साल में बनी थी।

चीफ इंजीनियर के मुताबिक, इस प्रतिमा का निर्माण भूकंपरोधी तकनीक से किया गया है। इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि 6.5 की तीव्रता का भूकंप और 220 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाओं का भी इस पर कोई असर नहीं होगा।

शिल्पकार राम सुथार का कहना है कि प्रतिमा को सिंधु घाटी सभ्यता की समकालीन कला से बनाया गया है। इसमें चार धातुआें के मिश्रण का उपयोग किया गया है। इससे इसमें बरसों तक जंग नहीं लगेगा। स्टैच्यू में 85% तांबा इस्तेमाल किया गया है।

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पद्मभूषण से सम्मानित 92 वर्षीय शिल्पकार राम वी. सुथार की कल्पना है और उन्होंने ही इस प्रतिमा को डिजाइन किया है। इससे पहले भी वे सैकड़ों प्रतिमाएं बना चुके हैं। जिसमें संसद भवन परिसर में लगी महात्मा गांधी की प्रतिमा भी शामिल है।

राम वी. सुथार मूल रूप से महाराष्ट्र के एक गांव (गोंदूर) के रहने वाले हैं। उनके पिता कारपेंटर थे और इस नाते उन्हें शिल्प कला विरासत में मिली थी. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई गांव में ही हुई और उसी दौरान गुरु श्रीराम कृष्ण जोशी से मिट्टी में जान डालने की कला यानी शिल्पकारी सीखना शुरू किया।

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