जाने कोरेगांव भीमा युद्ध क्या है और दलित अधिकारों के लिए इसका क्या महत्व है? - SSC EXAM LIVE

शुक्रवार, 15 मार्च 2019

जाने कोरेगांव भीमा युद्ध क्या है और दलित अधिकारों के लिए इसका क्या महत्व है?

जाने कोरेगांव भीमा युद्ध क्या है और दलित अधिकारों के लिए इसका क्या महत्व है?
भारत में जातिवाद और अतिवाद की वजह से हमेशा भारतीय समुदायों में झड़प और कभी कभी हिंसक झड़प होती रहती है। वैसे ही कुछ झड़प महाराष्ट्र के कोरेगांव में भी दलितों और मराठा समुदाय के बीच में भी होता रहा है । आइये जानते हैं की क्या कारण है 200 साल पहले हुयी लड़ाई पर दलितों और मराठा समुदाय के बीच टकराव का।
कोरेगांव भीमा युद्ध का संक्षिप्त इतिहास

भीमा- कोरेगांव में महार तथा अन्य दलित व पिछड़ी जातियां महाराष्ट्र एवं देश के अन्य भागों से अपने पूर्वजों के साहस, शौर्य और बलिदान का 200 वां वर्ष हर्षोल्लास के साथ मनाने के लिए 1 जनवरी को शौर्य स्थल भीमा- कोरेगांव पहुंचें थे। यह उत्सव वर्षों से दलित जातियों के बीच उत्साह और शौर्य का प्रतीक रहा है। यह उत्सव कोई पहली बार नहीं , अपितु वर्षों से चला आ रहा है। जब 1 जनवरी 1818 को महार जाति के बहुलता वाली अंग्रेज सेना ने पेशवा बाजीराव के सेना को धूल चटायी थी।

वो सिर्फ 500 थे, लेकिन दिल में जज़्बा था कि जातिवाद को हराना है। वे जान पर खेल गए, कई तो कट मरे, पर आख़िरकार, भीमााा कोरेगांव के मैदान से पेशवा की फ़ौज भाग गई। 1818 को इसी दिन महार सैनिकों ने पेशवाई को हराकर भारत को जातिमुक्त और लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में पहला ऐतिहासिक क़दम बढ़ाया" (वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल) जो आज से लगभग दो सौ साल पहले घटित हुई थी।
कोरेगांव भीमा युद्ध का क्या महत्व है

कुछ इतिहासकारों का मानना है की महारों और पेशवा फ़ौजों के बीच हुए इस युद्ध को विदेशी आक्रांता अँग्रेज़ों के ख़िलाफ़ भारतीय शासकों का युद्ध था, तथ्यात्मक रूप से वो ग़लत नहीं हैं। लेकिन कुछ इतिहासकार मानते हैं कि महारों के लिए ये अँग्रेज़ों की नहीं बल्कि अपनी अस्मिता की लड़ाई थी। अंत्यजों यानी वर्णव्यवस्था से बाहर माने गए 'अस्पृश्यों' के साथ जो व्यवहार प्राचीन भारत में होता था, वही व्यवहार पेशवा शासकों ने महारों के साथ किया।

इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके 'प्रदूषित और अपवित्र' पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ। उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण 'प्रदूषित और अपवित्र' न हो जाए। वो सवर्णों के कुएँ या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।

इस युद्ध में मारे गए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक चौकोर मीनार बनाया गया है, जिसे कोरेगांव स्तंभ के नाम से जाना जाता है। यह महार रेजिमेंट के साहस का प्रतीक है। इस मीनार पर उन शहीदों के नाम खुदे हुए हैं, जो इस लड़ाई में मारे गए थे। 1851 में इन्हें मेडल देकर सम्मानित किया गया। इस युद्ध में पेशवा की हार के बाद पेशवाई खतम हो गयी थी और अंग्रेजों को इस भारत देश की सत्ता मिली। इसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने भारत देश में शिक्षण का प्रचार किया, जो हजारों सालों से बहुजन समाज के लिए बंद था।

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